जब मनुष्य सकारात्मक ऊर्जा से घिरे रहते हैं और वे अपने अनुकूल दिशाओं का पालन करते हैं तब निरंतर खुश रहने के लिए उनके ७ चक्र योग्य दिशासे तथा पूर्ण प्रभारित होते हैं । अपने ७ चक्र खुलने से और स्वस्थ ऊर्जा के प्रवाह की अनुमति से अच्छे स्वास्थ्य तथा सकारात्मक विचारों को बनाए रखने का यह एक प्रभावी उपकरण है । चक्र ऊर्जा को परिवर्तित करनेवाले यंत्र हैं और ऐसे कहा जाता है कि, जिससे अनेक कार्य किए जाते हैं ऐसे विविध ऊर्जा क्षेत्र, शरीर तथा विस्तृत ब्रम्हांडीय ऊर्जाक्षेत्रों को जोडनेवाले विविध रंग की विद्युत ऊर्जा को घुमानेवाले चक्र हैं।

७ चक्र प्रत्यक्ष रूप से अंतःस्रावी (एन्डोक्राईन) ग्रंथी को जोडकर शरीर की सभी प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं जिससे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया का नियमन होता है । ७ चक्र शरीर के वलयांकित मंडल व भौतिक शरीर के भीतर की मध्यान्ह रेषा और विविध ब्रम्हांडीय बल तथा आभा मंडलों को जोड़नेवाला कार्यतंत्र है । वे शरीर की ऊर्जा प्रवाह को प्रभावित करते हैं । वातावरण से प्राथमिक ऊर्जा को अवशोषित करके साथ साथ ऊर्जा वाहिनीयों को भेजते हैं ।

हमारे शरीर में ७ चक्र और उनका अपने जीवन पर प्रभाव

सहस्र चक्र मस्तिष्क और सीर के बीच में स्थित हैं इसलिए उसे `शीर्ष चक्र’ भई कहा जाता है । ७ चक्र का यह पहला चक्र है । अगर सहस्रार चक्र सक्रिय नहीं है तो खिन्नता, पार्किन्सन्स रोग, विमनस्कता (स्कीझोफ्रेनिया), मिर्गी, बुढ़ापे में होनेवाला मनोभ्रंश, अल्जाइमर रोग, विविध मानसिक विकार, संभ्रमित अवस्था और चक्कर आने की प्रवृत्ति होती है ।        
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अजना चक्र को `भ्रुकुटी चक्र’ भी कहा जाता है क्योंकि वह माथे के केंद्र में स्थित है । यह ७ चक्र में से दुसरा चक्र है । अगर अजना चक्र सक्रिय नहीं है तो तनाव, सीरदर्द, तीव्र सीरदद (माइग्रेन), दृष्टीदोष, अदूरदर्शिता, दूर की चीजें देखने की क्षमता में दोष, ग्लूकोमा, मोतियाबिंदू, साइनस तथा कान की समस्याएँ आदि विकार हो सकते हैं ।                             
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विशुध्द चक्र को `कंठ चक्र’ भी कहा जाता है क्योंकि वह गले और फेफड़ों के क्षेत्र में स्थित हैं । यह ७ चक्र में तीसरा चक्र है । इस चक्र के सक्रिय न होने से थायराइड की समस्याओं (जादा व कम थायरॉईड होना), कम भूख लगना यह बीमारी बहु चक्र समस्या हैं लेकिन विशुध्द चक्र से इसका मजबूत संबंध है ।                                                                        
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अनाहत चक्र को हृदय (दिल) चक्र भी कहा जाता है क्योंकि यह हृदय में स्थित होता है । यह चक्र प्रणाली का चौथा चक्र है । अगर यह चक्र सक्रिय न हो तो दिल से जुड़ी बीमारियाँ हो सकती है । उदाहरण के लिए रोगक्षम शक्ती को बढ़ानेवाली प्रणाली से संबंधित बीमारियाँ हो सकती है ।                                                                                                 
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मणिपूर चक्र तथा सौर पेशी चक्र जो ७ चक्र की शृंखला में 5(पाँचवा)वा चक्र है । यह यकृत, प्लीहा और पेट में स्थित है । अगर यह चक्र सक्रिय न हो तो मधुमेह, अग्नाशयकोप, यकृत रोग, पेप्टिक अल्सर, पेट का रोग, पित्ताशय की पथरी आदि रोग संभवते हैं । यह चक्र नाभि के केंद्र में पसली के हड्डियों के पिंजरे के नीचे स्थित होता है ।                                      
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स्वाधिष्ठान चक्र को त्रिक चक्र भी कहा जाता है जो ७ चक्रों में ६ वा चक्र है । इसका स्थान गर्भाशय, बड़ी आंत, पुरःस्थ ग्रंथी (प्रोस्टेट), अंडाशय और वृषण क्षेत्र में होता है । इस चक्र की निष्क्रीयता से मासिक धर्म के पूर्व आनेवाले लक्षण, मासिक धर्म प्रवाह की समस्याएँ, गर्भाशय फायब्रॉइड, आंत्र सिन्ड्रोम, डिम्बग्रंथी पर गाँठ संबंधित विकार होते हैं ।            


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मूलाधार चक्र अथवा आधार चक्र यह नाम से जाना जाता है । यह रीढ (मेरूदंड) के तल पर स्थित है ।७ चक्रो की मालिका में यह ७ वा और अंतिम चक्र है । अगर मुलाधार चक्र सक्रिय न हो तो कब्ज, दस्त, बवासीर, कोलाइटिस (बड़ी आंत का प्रदाह), क्रोहन रोग, हांत और पैर की उंगलियाँ थंडी पड़ना, उच्च रक्तचाप से संबंधित समस्याएँ होती है ।

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