डॉ. चंद्रशेखर गुरूजी

हमारे संस्थापक, उपदेशक, दूरदर्शी और जनहितैषी

“सपने वो नहीं होते जो हम रात में देखते हैं, लेकिन चीजें जो हमें सोने नहीं देती उसे सपना कहते हैं” – एपीजे अब्दुल कलाम

हमारे श्रध्देय डॉ. चंद्रशेखर अंगडी (गुरूजी) जो सरल वास्तू के प्रणेता हैं तथा उसकी प्रेरणाशक्ती है उनके लिए यह उल्लेख वास्तव में उचित है ।

मानव जातिको सामना करनेवाली चुनौतियों के विषय में गुरूजी को बचपनसेही कुतूहल था और पीड़ा भी होती थी । जब वे 8 साल के थे तब उन्होंने निःस्वार्थ वृत्ती से पुराने मंदिरों के पुनरूज्जीवन के लिए लोगों से दान इकठ्ठा करना सुनिश्चित किया था । उनके पुरखों ने बनवाए हुए भारत के पुराने मंदिरों के पुनरूज्जीवन का यही उद्देश्य था कि लोगों के जीवन में खुशियों को वापस लाया जाए । उनके गाँव के मंदिर जो कभी सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर थे, उन मंदिरों का पुनरूज्जीवन करके अपने गाँव के लोगों के जीवन में खुशियाँ वापस लाना यही उनका केंद्रबिंदू  था ।

14 साल की किशोर अवस्था में गुरूजी के मन में विचार आने लगे कि किस प्रकार से वो अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं और तभी उन्होंने सशस्र बलों में (सेना में) भरती होने का निर्णय लिया । लेकिन 2-3 बार कोशिश करने के बावजूद वैद्यकीय कारणों से चयन ना हो सका ।

लेकिन वे अपने विचारों पर दृढ थे और मुंबई में सिविल कॉट्रॅक्टर के रूप में पेशेवर व्यवसाय की शुरूआत की । 1995 में जरूरतमंद लोगों की सेवा के उद्देश्य से `शरन संकुल ट्रस्ट’ नामक ट्रस्ट की स्थापना की जिसके संस्थापक और अभिभावक (ट्रस्टी) वो खुद थे ।

1998 के मध्ये में उन्होंने अपने सपनों के घर का कल्पनाचित्र का नक्शा बनाना शुरू किया और अपने सपनों में उसका विस्तार करने लगे । यह सपना उनको कुछ समय के लिए बार बार आता रहा और फिर उन्होंने उन बिंदुओं के संदर्भों को जोडने का प्रयत्न किया जो उन्हें अपने स्वप्नो में तथा अपने रोज के जीवन में आ रहे थे ।

समस्या की गहराई में जाने के बाद उन्हें यह एहसास हुआ की इन सब समस्याओं का मूल कारण उनके घर तथा कार्यस्थल से जुडा है और उन्होंने संकल्पना को समझने का प्रयास किया कि कैसे प्राचीन पूर्वजों ने अपनी बुध्दि तथा संसाधनों को मिलाकर चिरस्थायी सुंदर स्मारक बनाये होंगे जो वक्त के चलते, हुए विध्वंस में भी मजबूत खडे थे ।

यही वो `मुझे मिल गया’ (युरेका) क्षण था जिससे उन्होंने समय के साथ किये गए अनुसंधान से इस शास्र (शास्त्र) को अपनी संकल्पनाओं से विकसित और परिपूर्ण किया । `सरल वास्तु’ यह प्राचीन भारतीय संस्कृती तथा स्थापत्य कला के आधार पर एकमेव अद्वितीय वैज्ञानिक समाधान है जिसके अपनाने से व्यक्ति को सभी क्षेत्रों में खुशी और सफलता प्राप्त होती है ।

गुरूजी के पाँच सिध्दांत

एक युवा तथा ऊर्जस्वी चंद्रशेखर से जनहितैषी, मार्गदर्शक, उपदेशक और समाज के लिए गुरूजी में परिवर्तन होने तक उनके सपनों को साकार करने के लिए उन्होंने अथक काम किया । आज जो चंद्रशेखर गुरूजी हैं वो बनने के लिए उन्होंने अपने जीवन में इन पाँच सिध्दांतो का अंगीकार किया –

अपने जीवन में किसीको धोखा न दें

अपने जीवन में ईमानदारी से जीवन व्यतित करना मतलब अपने आत्मा का निर्विषीकरण करना है और जो व्यक्ति इसका भक्तिभाव से अभ्यास करते हैं उनको अपने व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक जीवन में भरपूर मात्रा में प्राप्त होता है ।

तरक्की की किसी भी स्थिती में पहुँचने पर भी हमेशा विनम्र रहना चाहिये

अगर आप सफलता के शिखर पर पहुँच गए हो, लेकिन यह जरूरी है कि वह अपनी जमीन से जुड़ा रहे और अपने स्वयं का होना बहुत महत्त्वपूर्ण है । इससे सफलता की प्राप्ती और अपने सहकारियों से इच्छित समर्थन सुनिश्चित होता है ।

अपने माता-पिता को हमेशा खुश रखें और उनसे आशिर्वाद पाएँ

टिया वॉकर ने यह उचित कहा है कि “जिन्होंने हमारी देखभाल की है उनकी सेवा करना यह एक सर्वोच्च सन्मान है” । हमारे जन्मदाताओं (माता-पिता) की देखभाल करने से निरंतर सुख, समृध्दि और सफलता अपने लिए तथा अपने परिवार के लिए हमेशा प्राप्त होता है ।

जरूरतमंदोंको हमेशा मदद करो

निःस्वार्थ प्रेम और सहायता देने से विपुलता आकर्षित होती है । विशेष रूप से जरूरतमंद लोगों के लिए किया जाए तो विपुलता में बढोत्तरी हो जाती है।

दुसरों को खुश रखने के लिए खुद खुश रहो

जहां हम रहते हैं तथा काम करते हैं, वही से प्रसन्नता (खुशी) की शुरूआत होती है । इसलिए आंतरिक खुशी को सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण है जिससे दुसरों को खुश रखने के लिए सक्षम हो सकें ।